खामोशी, कवी – विनोद राठोड
खामोशी एक काले टीले पर खड़ा मैं कूछ कहता हुँ तो तो चारों और गूँजती है मेरे अपने शिकस्त की आवाज नजरों के सामने एक मैदान है अरमानोंके घोड़े दौड़ते हुये ये मैदान , मैदान नही रणभुमी है…..! रणभूमी मुझे निहारती है रणभूमी मुझे पुकारती है रणभूमी मुझे ऊकसाती है ऐ धरती के राजपूत्र आओ…